₹AccountsDostकक्षा 11 · लेखाशास्त्र 🔥 0⭐ 0
नींव · पाठ 1 / 3 · ⏱ 25 मिनट

व्यापार की बुनियाद: ख़रीद, बिक्री, लाभ और उधार

🎯 इस पाठ के बाद आप यह कर पाओगे:
  • समझो कि व्यापार क्या है और इसके तीन मुख्य प्रकार कौन-से हैं
  • बिके हुए माल पर लाभ या हानि निकालो और समझो कि बिना बिका माल स्टॉक क्यों है
  • नकद और उधार लेन-देन में अंतर करो और देनदार व लेनदार पहचानो
  • मालिक और व्यापार को अलग रखो: पूँजी और आहरण

नमस्ते दोस्त! NCERT का पहला अध्याय खोलने से पहले 25 मिनट उन रोज़मर्रा की बातों पर लगाते हैं जिन्हें लेखाशास्त्र का हर अध्याय मानकर चलता है कि तुम्हें पता हैं: व्यापार असल में करता क्या है, लाभ कैसे निकलता है, "उधार" को हिसाब-किताब की भाषा में क्या कहते हैं, और दुकान का पैसा व दुकानदार का पैसा अलग क्यों रखना पड़ता है। यह सब तुम अपने बाज़ार में रोज़ देखते हो। आज हम बस इन्हें सही नाम देंगे। अभी न रोज़नामचा, न खाता बही, सिर्फ़ समझ और थोड़ा-सा हिसाब।

1. व्यापार क्या है?

व्यापार (Business) ऐसी कोई भी नियमित गतिविधि है जो लोगों को माल या सेवाएँ देकर लाभ कमाने के लिए की जाती है। ज़रूरी शब्द हैं नियमित और लाभ। अपनी पुरानी साइकिल एक बार बेच देना व्यापार नहीं है। पर हर हफ़्ते साइकिलें ख़रीदकर ऊँचे दाम पर बेचना व्यापार है।

1.1 व्यापार के तीन प्रकार

प्रकारक्या करता हैउदाहरण
व्यापारिक (Trading)तैयार माल ख़रीदकर बिना बदले बेचता हैकिराना दुकान, मोबाइल स्टोर, स्टेशनरी दुकान
विनिर्माण (Manufacturing)कच्चा माल ख़रीदकर नया उत्पाद बनाता है, फिर बेचता हैबिस्कुट बनाने वाली बेकरी, फर्नीचर कारख़ाना
सेवा (Service)माल नहीं, काम या हुनर बेचता हैट्यूशन सेंटर, ब्यूटी पार्लर, साइबर कैफ़े, कूरियर

कक्षा 11 लेखाशास्त्र में ज़्यादातर उदाहरण व्यापारिक व्यवसाय के होते हैं, क्योंकि इसे समझना सबसे आसान है: माल ख़रीदो, माल बेचो, ख़र्चे चुकाओ, और देखो कि क्या बचा।

खुर्जा में एक स्कूल के पास शर्मा स्टेशनरी नाम की छोटी दुकान है। शर्मा जी दिल्ली के एक थोक विक्रेता से कॉपियाँ, पेन और ज्यामिति बॉक्स ख़रीदते हैं और विद्यार्थियों को बेचते हैं। वे हर महीने दुकान का किराया, अपने सहायक राजू का वेतन और बिजली का बिल चुकाते हैं। वे फ़ोटोकॉपी की सेवा भी देते हैं। यानी उनका व्यापार मुख्य रूप से व्यापारिक है, साथ में थोड़ा सेवा का हिस्सा। इस पूरे पाठ में हम उन्हीं की दुकान के साथ चलेंगे।

2. ख़रीद और बिक्री: ज़रूरी शब्द

  • माल (Goods): वे चीज़ें जो व्यापार बेचने के लिए ख़रीदता है। शर्मा जी के लिए कॉपियाँ माल हैं। दुकान का काउंटर माल नहीं है, क्योंकि वह बेचने के लिए नहीं ख़रीदा गया।
  • क्रय (Purchases): दोबारा बेचने के लिए ख़रीदा गया माल। (दुकान के लिए काउंटर या कंप्यूटर ख़रीदना लेखांकन में "क्रय" नहीं, बल्कि परिसंपत्ति ख़रीदना है।)
  • विक्रय (Sales): ग्राहकों को बेचा गया माल।
  • क्रय मूल्य (Cost price, CP): जिस दाम पर माल ख़रीदा गया।
  • विक्रय मूल्य (Selling price, SP): जिस दाम पर माल बेचा गया।
  • स्टॉक (रहतिया) (Stock): किसी समय दुकान में पड़ा बिना बिका माल।

रोज़ की बोली में लोग कहते हैं "मैंने पंखा ख़रीदा (purchase किया)"। लेखांकन में क्रय का मतलब सिर्फ़ दोबारा बेचने के लिए ख़रीदा गया माल है। दुकान में इस्तेमाल के लिए ख़रीदा पंखा परिसंपत्ति (या व्यय) है, कभी "क्रय" नहीं। यह छोटा-सा शब्द अध्याय 3 में बहुत ग़लत उत्तर करवाता है।

3. लाभ और हानि

लाभ = विक्रय मूल्य − क्रय मूल्य (जब SP > CP)

हानि = क्रय मूल्य − विक्रय मूल्य (जब CP > SP)

बहुत ज़रूरी बात: लाभ सिर्फ़ उसी माल पर कमाया जाता है जो बिक गया। जो माल अभी दुकान में पड़ा है, उसने अभी कुछ नहीं कमाया। वह स्टॉक है।

शर्मा जी 100 कॉपियाँ ₹30 प्रति कॉपी की दर से ख़रीदते हैं। वे 80 कॉपियाँ ₹45 प्रति कॉपी बेचते हैं। उनका लाभ और स्टॉक में बची कॉपियों का मूल्य निकालो।
  1. 100 कॉपियों की कुल लागत = 100 × ₹30 = ₹3,000।
  2. विक्रय = 80 × ₹45 = ₹3,600।
  3. असल में बिकी 80 कॉपियों की लागत = 80 × ₹30 = ₹2,400।
  4. लाभ = ₹3,600 − ₹2,400 = ₹1,200।
  5. बिना बिकी कॉपियाँ = 20, लागत पर मूल्य: 20 × ₹30 = ₹600।
लाभ = ₹1,200 और अंतिम स्टॉक = ₹600। (अगर तुमने ग़लती से ₹3,600 − ₹3,000 किया, तो ₹600 आएगा और दुकान में पड़ी 20 कॉपियाँ भूल जाओगे।)

स्टॉक का मूल्य लागत पर लगाते हैं, विक्रय मूल्य पर नहीं। दुकान ने उसे अभी बेचा नहीं, इसलिए उस पर लाभ नहीं गिन सकती। यही रूढ़िवादिता का विचार है, जो तुम अध्याय 2 में पढ़ोगे।

3.1 सकल लाभ और शुद्ध लाभ

सिर्फ़ माल बेचना पूरी कहानी नहीं है। दुकान व्यय (Expenses) भी चुकाती है: किराया, वेतन, बिजली, ढुलाई। इसलिए लेखाकार दो लाभ की बात करते हैं:

  • सकल लाभ (Gross profit) = विक्रय − बेचे गए माल की लागत। (सिर्फ़ ख़रीदने-बेचने से लाभ।)
  • शुद्ध लाभ (Net profit) = सकल लाभ − अन्य व्यय। (मालिक के लिए असल में जो बचा।)
अप्रैल 2026 में शर्मा स्टेशनरी का विक्रय ₹1,20,000 रहा। बेचे गए माल की लागत ₹90,000 थी। किराया ₹8,000, राजू का वेतन ₹6,000 और बिजली ₹2,000। सकल लाभ और शुद्ध लाभ निकालो।
  1. सकल लाभ = ₹1,20,000 − ₹90,000 = ₹30,000।
  2. कुल व्यय = ₹8,000 + ₹6,000 + ₹2,000 = ₹16,000।
  3. शुद्ध लाभ = ₹30,000 − ₹16,000 = ₹14,000।
सकल लाभ ₹30,000; शुद्ध लाभ ₹14,000।

एक मोबाइल स्टोर 40 फ़ोन कवर ₹250 प्रति कवर ख़रीदता है और सभी ₹310 प्रति कवर बेच देता है। कुल लाभ (₹ में) कितना है?

एक कवर पर लाभ = SP − CP। फिर बिके कवरों की संख्या से गुणा करो।
प्रति कवर लाभ = ₹310 − ₹250 = ₹60। सभी 40 बिक गए, इसलिए कुल लाभ = 40 × ₹60 = ₹2,400।

एक किराना दुकान का मई 2026 का विक्रय ₹80,000 है और बेचे गए माल की लागत ₹60,000 है। किराया ₹5,000 और मज़दूरी ₹4,000 है। शुद्ध लाभ (₹ में) निकालो।

पहले सकल लाभ, फिर दोनों व्यय घटाओ।
सकल लाभ = ₹80,000 − ₹60,000 = ₹20,000। शुद्ध लाभ = ₹20,000 − ₹5,000 − ₹4,000 = ₹11,000।

4. आगम और व्यय, अभिलाभ और हानि

ये चार शब्द NCERT के लगभग हर पन्ने पर आते हैं, इसलिए इन्हें अभी पक्का कर लेते हैं।

शब्दसरल अर्थशर्मा स्टेशनरी का उदाहरण
आगम (Revenue)व्यापार के सामान्य, नियमित काम से कमाईकॉपियों की बिक्री, फ़ोटोकॉपी शुल्क
व्यय (Expense)व्यापार चलाने और आगम कमाने के लिए चुकाई गई लागतकिराया, वेतन, बिजली
अभिलाभ (Gain)ऐसे काम से लाभ जो सामान्य काम नहीं हैदुकान का पुराना कंप्यूटर उसके पुस्तक मूल्य से ज़्यादा में बेचना
हानि (Loss)ऐसा पैसा जो गया और बदले में कुछ नहीं मिलापानी रिसने से ख़राब हुआ माल, चोरी हुई नकदी

लाभ और नकदी एक चीज़ नहीं हैं। दुकान लाभ कमाकर भी कम नकदी रख सकती है, जैसे जब कई ग्राहकों ने अभी पैसे नहीं दिए। इसीलिए अगला विचार ज़रूरी है।

5. नकद लेन-देन और उधार लेन-देन

जब भुगतान सौदे के साथ ही हो जाए, तो वह नकद लेन-देन (Cash transaction) है। लेखांकन में उसी समय UPI, कार्ड या चेक से भुगतान भी नकद जैसा ही माना जाता है (पैसा बैंक से जाता है, पर उधार नहीं बनता)।

जब भुगतान बाद में करने का वादा हो, तो वह उधार लेन-देन (Credit transaction) है। उधार से दो बहुत ज़रूरी व्यक्ति बनते हैं:

देनदार (Debtor): वह व्यक्ति जिस पर व्यापार का पैसा बाकी है, क्योंकि उसने उधार माल या सेवा ली। (उसे हमें देना है।)

लेनदार (Creditor): वह व्यक्ति जिसका पैसा व्यापार पर बाकी है, क्योंकि व्यापार ने उससे उधार माल या सेवा ली। (हमें उसे देना है।)

5 अप्रैल 2026 को शर्मा जी ने वर्मा कोचिंग सेंटर को ₹5,000 का माल उधार बेचा। 8 अप्रैल को उन्होंने गुप्ता होलसेलर्स से ₹20,000 का माल उधार ख़रीदा और 20 अप्रैल को उन्हें ₹12,000 चुकाए। देनदार कौन, लेनदार कौन, और शर्मा जी पर अभी कितना बाकी है?
  1. वर्मा कोचिंग सेंटर को शर्मा जी को ₹5,000 देने हैं। इसलिए वर्मा देनदार है।
  2. शर्मा जी को गुप्ता होलसेलर्स को देना है। इसलिए गुप्ता होलसेलर्स लेनदार है।
  3. गुप्ता का अभी बाकी = ₹20,000 − ₹12,000 = ₹8,000।
देनदार: वर्मा कोचिंग सेंटर (₹5,000)। लेनदार: गुप्ता होलसेलर्स (₹8,000 अभी देय)।

देनदार = जिसे देना है (वह हमें देगा)। लेनदार = जिसे लेना है (वह हमसे लेगा)। अंग्रेज़ी में: DE-btor = DEna hai।

प्रिया ने शर्मा स्टेशनरी से ₹900 का स्कूल बैग लिया और अगले हफ़्ते पैसे देने का वादा किया। दुकान के लिए प्रिया क्या कहलाएगी: देनदार या लेनदार?

किसे किसको पैसे देने हैं?
प्रिया को दुकान को पैसे देने हैं, इसलिए दुकान के लिए वह देनदार है।

6. मालिक और व्यापार दो अलग व्यक्ति हैं

पूरे विषय का यह सबसे ज़रूरी विचार है। लेखांकन में व्यापार को उसके मालिक से अलग माना जाता है, चाहे छोटी दुकान एक ही व्यक्ति अकेले चलाता हो।

  • पूँजी (Capital): मालिक द्वारा व्यापार में लगाया गया पैसा या माल। व्यापार के लिए पूँजी वह राशि है जो उसे मालिक को "लौटानी" है।
  • आहरण (Drawings): मालिक द्वारा निजी या पारिवारिक उपयोग के लिए व्यापार से निकाला गया पैसा या माल।

शर्मा जी ने 1 अप्रैल 2026 को अपनी बचत के ₹2,00,000 से दुकान शुरू की। वे ₹2,00,000 दुकान की पूँजी हैं। 15 अप्रैल को उन्होंने बेटे की स्कूल फ़ीस के लिए दुकान की नकदी से ₹5,000 निकाले, और उनकी पत्नी बच्चों के लिए पेन का एक डिब्बा घर ले गईं। दोनों आहरण हैं। ये व्यापार के व्यय नहीं हैं, क्योंकि इनसे व्यापार को कुछ नहीं मिला।

दुकान के पैसे से मालिक के घर का किराया या घर का बिजली बिल चुकाना आहरण है, "किराया" या "बिजली" व्यय नहीं। सिर्फ़ दुकान का किराया और बिजली ही व्यापार का व्यय है।

एक मोबाइल स्टोर का मालिक अपनी बेटी के उपहार के लिए दुकान की नकदी से ₹3,000 निकालता है। दुकान के खातों में यह है:
  • व्यापार का व्यय
  • व्यापार की हानि
  • आहरण
  • पूँजी
पैसा मालिक के निजी उपयोग के लिए व्यापार से बाहर गया, इसलिए यह आहरण है। इससे मालिक का व्यापार पर दावा (पूँजी) घटता है, पर यह व्यय नहीं है, क्योंकि व्यापार को बदले में कुछ नहीं मिला।

7. व्यापार के पास क्या है और उस पर क्या बाकी है (पहली झलक)

किसी भी समय व्यापार के पास कुछ चीज़ें होती हैं और कुछ राशियाँ उस पर बाकी होती हैं।

  • परिसंपत्तियाँ (Assets) = जो व्यापार के पास है और जिससे लाभ मिलेगा: नकदी, बैंक शेष, माल का स्टॉक, फर्नीचर, कंप्यूटर, और देनदारों से मिलने वाली राशि।
  • देयताएँ (Liabilities) = जो व्यापार को बाहरी लोगों को देना है: लेनदार, बैंक ऋण, बिना चुकाए बिल।
  • पूँजी = जो व्यापार को अपने मालिक को देना है।

व्यापार के पास जो कुछ भी है, उसका पैसा या तो बाहरी लोगों ने दिया या मालिक ने। इसलिए दोनों तरफ़ हमेशा बराबर होनी चाहिए। यही अध्याय 3 का प्रसिद्ध लेखांकन समीकरण (Accounting equation) है: परिसंपत्तियाँ = देयताएँ + पूँजी। इसे याद रखो; पूरी किताब की रीढ़ यही है।

इनमें से कौन-सी शर्मा स्टेशनरी की परिसंपत्ति नहीं है?
  • दुकान में पड़ी बिना बिकी कॉपियाँ
  • गुप्ता होलसेलर्स को देय ₹8,000
  • वर्मा कोचिंग सेंटर से मिलने वाले ₹5,000
  • दुकान का कंप्यूटर
गुप्ता होलसेलर्स को देय ₹8,000 वह राशि है जो व्यापार पर बाकी है, इसलिए यह देयता (लेनदार) है। बाकी सब व्यापार के पास हैं या उसे मिलने वाले हैं।

📌 याद रखने वाली बातें (त्वरित दोहराव)

  • व्यापार लाभ कमाने की नियमित गतिविधि है: व्यापारिक, विनिर्माण या सेवा।
  • क्रय = सिर्फ़ दोबारा बेचने के लिए ख़रीदा माल; उपयोग के लिए ख़रीदी परिसंपत्ति क्रय नहीं है।
  • लाभ सिर्फ़ बिके माल पर कमाया जाता है; बिना बिका माल स्टॉक है, जिसका मूल्य लागत पर लगता है।
  • सकल लाभ = विक्रय − बेचे गए माल की लागत; शुद्ध लाभ = सकल लाभ − व्यय।
  • देनदार पर व्यापार का पैसा बाकी है; लेनदार का पैसा व्यापार पर बाकी है (उधार से दोनों बनते हैं)।
  • मालिक और व्यापार अलग हैं: लगाया गया पैसा पूँजी है, निजी उपयोग के लिए निकाला गया पैसा आहरण है।

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