लेखांकन प्रणालियाँ, लेखांकन आधार, मानक और GST की मूल बातें
- दोहरा लेखा और इकहरा लेखा प्रणाली की तुलना कर पाओगे
- रोकड़ आधार और उपार्जन आधार पर लाभ निकालकर अंतर समझा पाओगे
- लेखांकन मानकों का अर्थ, आवश्यकता, लाभ और सीमाएँ, Ind AS और IFRS की झलक सहित, समझा पाओगे
- GST, CGST, SGST और IGST समझकर साधारण बिक्री पर लगा पाओगे
फिर से नमस्ते! अब हम तेरह अवधारणाएँ जानते हैं। आज हम थोड़ा पीछे हटकर तीन व्यावहारिक सवाल पूछेंगे। लेखे कैसे रखे जाएँ: पूरे (दोहरा लेखा) या अधूरे (इकहरा लेखा)? लेन-देन कब गिना जाए: जब नकद आए-जाए (रोकड़ आधार) या जब वह कमाया या किया जाए (उपार्जन आधार)? और कौन पक्का करता है कि भारत का हर व्यवसाय एक जैसे नियम माने? इससे हम लेखांकन मानकों तक पहुँचेंगे, और आखिर में GST तक, वह कर जो तुम्हारे देखे लगभग हर बिल पर होता है। अध्याय 3 में यह सब काम आएगा, इसलिए ध्यान से पढ़ो।
1. लेखांकन की प्रणालियाँ
लेन-देन लिखने की दो प्रणालियाँ हैं: दोहरा लेखा प्रणाली (Double entry system) और इकहरा लेखा प्रणाली (Single entry system)।
1.1 दोहरा लेखा प्रणाली
दोहरा लेखा प्रणाली द्विपक्ष अवधारणा पर आधारित है: हर लेन-देन के दो प्रभाव होते हैं (लाभ पाना और लाभ देना), इसलिए वह कम से कम दो खातों में लिखा जाता है। हर नाम (Dr.) के सामने उतनी ही राशि का जमा (Cr.) होता है।
- यह एक पूर्ण प्रणाली है, क्योंकि हर लेन-देन के दोनों पक्ष लिखे जाते हैं।
- यह सटीक और विश्वसनीय है; धोखाधड़ी और गबन की संभावना कम होती है।
- तलपट (Trial balance) बनाकर गणितीय शुद्धता जाँची जा सकती है (अध्याय 6)।
- इसे बड़े और छोटे दोनों संगठन अपना सकते हैं। सभी कंपनियों को इसे ही अपनाना होता है।
1.2 इकहरा लेखा प्रणाली
इकहरा लेखा प्रणाली एक अपूर्ण प्रणाली है जिसमें हर लेन-देन का दोहरा प्रभाव नहीं लिखा जाता। सामान्यतः केवल व्यक्तिगत खाते (देनदार और लेनदार) और रोकड़ बही रखी जाती है।
- कुछ लेन-देनों का एक पक्ष लिखा जाता है, कुछ के दोनों। कोई एकरूपता नहीं, इसलिए इसे अक्सर "प्रणाली का अभाव" या अपूर्ण लेखे (Incomplete records) कहते हैं।
- लेखे अपूर्ण, अव्यवस्थित और अविश्वसनीय होते हैं। इनसे तलपट नहीं बन सकता।
- फिर भी कुछ छोटे व्यापारी इसे अपनाते हैं क्योंकि यह सरल और लचीली है।
रामू की पान की दुकान में बस एक डायरी है: "मोहन पर ₹450 बाकी", "दूधवाले को ₹1,200 दिए", और गल्ले में रखा नकद। यह इकहरा लेखा है। शर्मा ट्रेडर्स Tally प्रयोग करती है और हर बिक्री का स्टॉक, रोकड़, ग्राहक और GST पर प्रभाव लिखती है। यह दोहरा लेखा है। जब रामू को बैंक ऋण चाहिए, वह अपना लाभ साबित करने में अटक जाता है; शर्मा ट्रेडर्स बस अपने विवरण प्रिंट कर देती है।
| आधार | दोहरा लेखा | इकहरा लेखा |
|---|---|---|
| लेखा | हर लेन-देन के दोनों पक्ष | कई लेन-देनों का केवल एक पक्ष |
| रखे जाने वाले खाते | व्यक्तिगत, वास्तविक और नाममात्र खाते | मुख्यतः व्यक्तिगत खाते और रोकड़ बही |
| तलपट | बनाया जा सकता है | नहीं बनाया जा सकता |
| विश्वसनीयता | विश्वसनीय, धोखाधड़ी पकड़ना आसान | अविश्वसनीय |
| किसके लिए उपयुक्त | सभी संगठन | केवल छोटे व्यापारी |
2. लेखांकन का आधार: रोकड़ बनाम उपार्जन
यहाँ सवाल समय का है: आगम और व्यय किस अवधि में माने जाएँ?
2.1 रोकड़ आधार
रोकड़ आधार (Cash basis) में प्रविष्टियाँ तभी की जाती हैं जब नकद वास्तव में प्राप्त या भुगतान हो, न कि जब प्राप्ति या भुगतान देय हो।
- मार्च का किराया अप्रैल में चुकाया तो वह अप्रैल में लिखा जाएगा।
- जनवरी में हुआ उधार विक्रय तभी लिखा जाएगा जब ग्राहक भुगतान करे, मान लो अप्रैल में।
- लाभ = अवधि की नकद प्राप्तियाँ − नकद भुगतान।
- यह सरल है, पर मिलान अवधारणा के विरुद्ध है, इसलिए ज़्यादातर संगठनों के लिए अनुपयुक्त है।
2.2 उपार्जन आधार
उपार्जन आधार (Accrual basis) में आगम और लागतें उसी अवधि में मानी जाती हैं जिसमें वे घटित होती हैं (कमाई या खर्च होती हैं), चाहे उस अवधि में नकद मिला या चुकाया गया हो या नहीं।
- यह नकद प्राप्ति और नकद पाने के अधिकार में, तथा नकद भुगतान और भुगतान के कानूनी दायित्व में अंतर करता है।
- यह आगम मान्यता और मिलान का पालन करता है, इसलिए सही लाभ देता है। कंपनियों को इसे ही अपनाना होता है।
नकद विक्रय ₹5,00,000; उधार विक्रय ₹2,00,000, जिसमें से ₹1,50,000 वसूल हुए। पिछले वर्ष के ग्राहकों से भी ₹30,000 वसूल हुए।
क्रय: नकद ₹3,00,000; उधार ₹1,00,000, जिसमें से ₹80,000 चुकाए गए।
किराया ₹10,000 प्रति माह है; 11 महीने का किराया चुकाया गया।
(a) रोकड़ आधार और (b) उपार्जन आधार पर लाभ निकालो।
- (a) नकद प्राप्तियाँ = 5,00,000 + 1,50,000 + 30,000 = 6,80,000।
- नकद भुगतान = क्रय 3,00,000 + 80,000 + किराया 1,10,000 = 4,90,000। रोकड़ आधार पर लाभ = 6,80,000 − 4,90,000 = 1,90,000।
- (b) कमाया गया आगम = वर्ष का पूरा विक्रय = 5,00,000 + 2,00,000 = 7,00,000। पिछले वर्ष के ₹30,000 इस वर्ष का आगम नहीं हैं।
- किए गए व्यय = क्रय 4,00,000 + 12 महीने का किराया 1,20,000 = 5,20,000। उपार्जन आधार पर लाभ = 7,00,000 − 5,20,000 = 1,80,000।
मद रोकड़ आधार (₹) उपार्जन आधार (₹) विक्रय / प्राप्तियाँ 6,80,000 7,00,000 क्रय 3,80,000 4,00,000 किराया 1,10,000 1,20,000 लाभ 1,90,000 1,80,000
एक कोचिंग सेंटर का वित्तीय वर्ष 2026-27: वर्ष में अर्जित फीस ₹2,40,000 (इसमें से ₹30,000 अभी नहीं मिले); अगले वर्ष के बैच के लिए ₹25,000 अग्रिम मिला; वर्ष का वेतन ₹1,20,000 (₹10,000 अभी बकाया); बिजली ₹12,000 (पूरी चुकाई)। उपार्जन आधार पर लाभ निकालो (₹ में)।
उपार्जन लाभ = 2,40,000 − 1,32,000 = ₹1,08,000
उसी कोचिंग सेंटर का रोकड़ आधार पर लाभ निकालो (₹ में)।
भुगतान = (1,20,000 − 10,000) + 12,000 = 1,22,000।
रोकड़ आधार पर लाभ = 2,35,000 − 1,22,000 = ₹1,13,000
"रोकड़ आधार / उपार्जन आधार" (समय का सवाल) को "इकहरा / दोहरा लेखा" (लेखे की पूर्णता का सवाल) से मत मिलाओ। कोई व्यवसाय उपार्जन आधार पर दोहरा लेखा रख सकता है, और सामान्यतः यही होता है।
3. लेखांकन मानक
लेखांकन मानक (Accounting Standards) किसी विशेषज्ञ लेखांकन संस्था (भारत में ICAI) द्वारा जारी लिखित नीति-प्रलेख हैं, जो वित्तीय विवरणों में लेन-देनों की मान्यता, मापन, व्यवहार, प्रस्तुति और प्रकटीकरण से जुड़े हैं।
अवधारणाएँ मोटे विचार देती हैं; मानक उन्हें विस्तृत, एकसमान नियमों में बदलते हैं। जैसे, रूढ़िवादिता का विचार "स्टॉक लागत या बाज़ार मूल्य में जो कम हो उस पर" स्टॉक मूल्यांकन के मानक में ठीक-ठीक लिखा गया है।
3.1 उद्देश्य और आवश्यकता
- लेखांकन नीतियों में एकरूपता लाना और वित्तीय विवरणों की अतुलनीयता दूर करना।
- मानक लेखांकन नीतियाँ, मूल्यांकन मानदंड और प्रकटीकरण आवश्यकताएँ देना।
- लेखांकन आँकड़ों की साख और विश्वसनीयता बढ़ाना।
- वरना अलग-अलग व्यवसाय एक ही मद के लिए अलग-अलग व्यवहार चुन सकते हैं। मानक चुनाव को उन्हीं व्यवहारों तक सीमित करते हैं जो सत्य और उचित तस्वीर दें।
3.2 लाभ
- ये लेखांकन व्यवहार की भिन्नताएँ दूर करते हैं।
- ये कानून से अधिक प्रकटीकरण माँग सकते हैं, जो जनता, निवेशकों और लेनदारों के काम का हो।
- ये वित्तीय विवरणों को तुलनीय बनाते हैं, कंपनियों के बीच (अंतर) भी और एक ही कंपनी में वर्षों के बीच (अंतः) भी।
3.3 सीमाएँ
- ये वैकल्पिक व्यवहारों में से चुनाव को कठिन बनाते हैं।
- इन्हें कठोरता से लागू किया जाता है, लचीलापन नहीं रहता।
- ये कानून से ऊपर नहीं हो सकते। मानक मौजूदा कानूनों के दायरे में ही बनाए जाते हैं।
लाभ = "ए-प्र-तु": एकरूपता, अधिक प्रकटीकरण, तुलनीयता। सीमाएँ = "च-क-का": चुनाव कठिन, कठोरता, कानून इनसे ऊपर।
3.4 AS, Ind AS और IFRS: एक झलक
| समूह | कौन जारी करता है | कौन प्रयोग करता है |
|---|---|---|
| AS (लेखांकन मानक) | ICAI; कंपनियों के लिए केंद्र सरकार अधिसूचित करती है | छोटी कंपनियाँ और वे व्यवसाय जो Ind AS के दायरे में नहीं |
| Ind AS (भारतीय लेखांकन मानक) | ICAI तैयार करता है, कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय अधिसूचित करता है | सूचीबद्ध कंपनियाँ और बड़ी कंपनियाँ (2016-17 से चरणों में लागू) |
| IFRS (अंतरराष्ट्रीय वित्तीय रिपोर्टिंग मानक) | अंतरराष्ट्रीय लेखांकन मानक बोर्ड (IASB) | कई देशों में प्रयोग; Ind AS काफ़ी हद तक IFRS से मेल खाते हैं |
कुछ AS जिनसे तुम फिर मिलोगे: AS 1 लेखांकन नीतियों का प्रकटीकरण, AS 2 स्टॉक (माल-सूची) का मूल्यांकन, AS 3 रोकड़ प्रवाह विवरण, AS 9 आगम मान्यता, AS 10 संपत्ति, संयंत्र और उपकरण।
AS 1 तीन विचारों को मूलभूत लेखांकन मान्यताएँ मानता है: निरंतरता, एकरूपता और उपार्जन। अगर कोई व्यवसाय इनमें से किसी का पालन नहीं करता, तो उसे यह बात प्रकट करनी होगी। पाठ 1, 2 और 3 का सुंदर जोड़!
4. वस्तु एवं सेवा कर (GST): मूल बातें
GST (Goods and Services Tax) वस्तुओं और सेवाओं के उपभोग पर लगने वाला गंतव्य-आधारित कर है, जो निर्माण से अंतिम बिक्री तक हर चरण पर लगता है, और पिछले चरणों पर चुकाए कर की साख (आगत कर साख, input tax credit) मिलती है। हर चरण पर केवल जोड़े गए मूल्य पर कर लगता है, और अंत में इसका भार उपभोक्ता उठाता है।
"गंतव्य-आधारित" का अर्थ है कि कर उस जगह की सरकार को मिलता है जहाँ माल या सेवा का उपभोग होता है (आपूर्ति का स्थान)। GST 1 जुलाई 2017 से लागू हुआ और इसने केंद्रीय उत्पाद शुल्क, VAT, प्रवेश कर, विलासिता कर, मनोरंजन कर जैसे कई करों की जगह ली। इसीलिए नारा है "एक राष्ट्र, एक कर"।
4.1 तीन घटक
| घटक | पूरा नाम | कब लगता है | राजस्व किसे |
|---|---|---|---|
| CGST | केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर | राज्य के भीतर बिक्री (अंतःराज्यीय) | केंद्र सरकार |
| SGST | राज्य वस्तु एवं सेवा कर | राज्य के भीतर बिक्री (अंतःराज्यीय), CGST के साथ | राज्य सरकार |
| IGST | एकीकृत वस्तु एवं सेवा कर | एक राज्य से दूसरे राज्य में बिक्री (अंतरराज्यीय) और आयात | केंद्र वसूलता है, गंतव्य राज्य के साथ बाँटता है |
भारत एक संघीय देश है: केंद्र और राज्य दोनों को कर लगाने का अधिकार है। इसीलिए GST एक दोहरा कर है: केंद्र CGST और IGST लगाता व संभालता है, और हर राज्य अपना SGST लगाता व संभालता है। इसके लिए संविधान में संशोधन किया गया।
एक ही राज्य → दो भागों में बँटा (CGST + SGST)। अलग-अलग राज्य → एक एकीकृत कर (IGST)। कुल दर दोनों में बराबर रहती है।
- (i) दोनों पक्ष उ.प्र. में हैं: अंतःराज्यीय बिक्री। CGST = 10,000 का 9% = 900; SGST = 10,000 का 9% = 900। बीजक का कुल = 10,000 + 900 + 900 = 11,800।
- (ii) उ.प्र. से राजस्थान: अंतरराज्यीय बिक्री। IGST = 25,000 का 18% = 4,500। बीजक का कुल = 29,500।
- क्रय पर चुकाया GST (आगत कर) = 10,000 का 18% = 1,800।
- विक्रय पर वसूला GST (निर्गत कर) = 15,000 का 18% = 2,700।
- वह आगत कर को निर्गत कर से समायोजित (set off) करता है: 2,700 − 1,800 = 900।
- जाँच: जोड़ा गया मूल्य = 15,000 − 10,000 = 5,000, और 5,000 का 18% = 900।
गुजरात का एक डीलर राजस्थान के एक ग्राहक को ₹65,000 का माल बेचता है। GST दर 18% है। कितना IGST लगेगा (₹ में)?
4.2 GST की विशेषताएँ (NCERT के अनुसार)
- पूरे देश में एक ही प्रशासन के अंतर्गत एक समान कानून और प्रक्रिया।
- गंतव्य-आधारित कर, जिसका भार उपभोग के बिंदु पर अंतिम उपभोक्ता उठाता है।
- माल और सेवाओं दोनों पर व्यापक कर, आगत कर साख के लाभ सहित।
- कर की दरें कम संख्या में।
- उपकर, पुनर्विक्रय कर, अतिरिक्त कर, टर्नओवर कर आदि की कोई गुंजाइश नहीं।
- बिक्री कर, प्रवेश कर, चुंगी, मनोरंजन कर या विलासिता कर जैसे अनेक कर नहीं।
4.3 GST के लाभ
- माल और सेवाओं पर अनेक प्रकार के करों की समाप्ति।
- कर-आधार का विस्तार और केंद्र व राज्यों का राजस्व बढ़ा, प्रशासनिक लागत घटी।
- अनुपालन लागत कम और स्वैच्छिक अनुपालन अधिक।
- व्यापक प्रभाव (कर पर कर) की समाप्ति।
- बेहतर निर्माण और वितरण, और निर्यात बाज़ार में भारतीय माल की प्रतिस्पर्धा।
- व्यवसाय मॉडल, संगठन के ढाँचे और स्थान के प्रति तटस्थ, जिससे दीर्घकालीन आर्थिक विकास को बढ़ावा।
GST परिषद समय-समय पर GST दरें बदलती है। सितंबर 2025 से ज़्यादातर माल और सेवाएँ दो मुख्य स्लैब, 5% और 18%, में लाई गईं, और कुछ विलासिता व हानिकारक वस्तुओं के लिए एक विशेष ऊँची दर रखी गई। उदाहरणों में हम NCERT की तरह 18% (9% + 9%) लेते हैं।
5. झटपट जाँच
- केवल IGST
- केवल CGST
- CGST और SGST
- SGST और IGST
- ये देश के कानून से ऊपर नहीं हो सकते
- ये लेखांकन को अधिक लचीला बनाते हैं
- इन्हें SEBI जारी करता है
- ये केवल इकहरे लेखे पर लागू होते हैं
बोर्ड टिप: "रोकड़ आधार और उपार्जन आधार में अंतर कीजिए" 3–4 अंक का आम प्रश्न है। दो खानों की तालिका में 3–4 बिंदु लिखो (अर्थ, आगम/व्यय की मान्यता, मिलान, लाभ की विश्वसनीयता, उपयुक्तता) और 4 अंक के प्रश्न में ₹ वाला एक छोटा उदाहरण जोड़ दो।
📌 याद रखने वाली बातें (त्वरित दोहराव)
- दोहरा लेखा हर लेन-देन के दोनों पक्ष लिखता है, पूर्ण और विश्वसनीय है, और इससे तलपट बनता है; इकहरा लेखा अपूर्ण (मुख्यतः व्यक्तिगत खाते और रोकड़ बही) और अविश्वसनीय है।
- रोकड़ आधार केवल नकद मिलने या चुकाने पर लिखता है; उपार्जन आधार आगम और व्यय को कमाने या होने पर लिखता है और सही लाभ देता है।
- लेखांकन मानक (ICAI द्वारा जारी) एकरूपता, अधिक प्रकटीकरण और तुलनीयता लाते हैं, पर कठोर हैं और कानून से ऊपर नहीं; Ind AS (IFRS से मेल खाते) सूचीबद्ध और बड़ी कंपनियों पर लागू होते हैं।
- AS 1 निरंतरता, एकरूपता और उपार्जन को मूलभूत लेखांकन मान्यताएँ मानता है।
- GST उपभोग पर गंतव्य-आधारित कर है जिसमें आगत कर साख मिलती है, इसलिए केवल जोड़े गए मूल्य पर कर लगता है; अंतःराज्यीय बिक्री पर CGST + SGST, अंतरराज्यीय पर IGST।
दबाने से आपकी प्रगति इसी फ़ोन/कंप्यूटर पर सेव होगी।