₹AccountsDostकक्षा 11 · लेखाशास्त्र 🔥 0⭐ 0
📘 नियम और प्रारूप पत्रक

हर नियम और प्रारूप एक जगह

परीक्षा से एक दिन पहले यह पेज ज़रूर दोहराना। लेखाशास्त्र में प्रारूप के भी अंक मिलते हैं, इसलिए कॉलम और शीर्षक ठीक-ठीक याद करो।

📒 अध्याय 1: लेखांकन – एक परिचय

  • लेखांकन = आर्थिक सूचनाओं की पहचान, मापन, अभिलेखन और इच्छुक उपयोगकर्ताओं तक संप्रेषणक्रम: पहचान → मापन → अभिलेखन → संप्रेषण। बहीखाता = सिर्फ़ अभिलेखन वाला हिस्सा; लेखांकन आगे सारांश, विश्लेषण और संप्रेषण भी करता है।
  • उपयोगकर्ता: आंतरिक (स्वामी, प्रबंधन, कर्मचारी) · बाह्य (निवेशक, ऋणदाता/बैंक, लेनदार, सरकार व कर अधिकारी, ग्राहक, जनता)
  • गुणात्मक विशेषताएँ: विश्वसनीयता · प्रासंगिकता · बोधगम्यता · तुलनीयताविश्वसनीय = सत्यापन योग्य, पक्षपात रहित; प्रासंगिक = समय पर और निर्णय के लिए उपयोगी
  • पूँजी = स्वामी द्वारा लगाई गई राशि · आहरण = स्वामी द्वारा निजी उपयोग के लिए निकाला गया पैसा/माल
  • परिसंपत्तियाँ: गैर-चालू (भूमि, भवन, मशीनरी, फर्नीचर; लंबे समय के उपयोग हेतु) और चालू (रोकड़, बैंक, स्टॉक, देनदार, प्राप्य विपत्र; एक वर्ष के भीतर)
  • देयताएँ: गैर-चालू (दीर्घकालीन ऋण) और चालू (लेनदार, देय विपत्र, अदत्त व्यय)
  • पूँजीगत खर्च (कई वर्षों तक लाभ, जैसे मशीनरी ख़रीदना) बनाम आयगत खर्च (उसी वर्ष लाभ, जैसे किराया, मज़दूरी)
  • आगम = सामान्य व्यापार से आय (विक्रय, कमीशन, ब्याज) · व्यय = आगम कमाने की लागत · अभिलाभ = अनियमित गतिविधि से लाभ · हानि = बिना लाभ वाला व्यय
  • देनदार पर व्यापार का पैसा बाकी है · लेनदार का पैसा व्यापार पर बाकी हैक्रय/विक्रय = सिर्फ़ दोबारा बेचने हेतु ख़रीदा/बेचा माल; स्टॉक (रहतिया) = बिना बिका माल, लागत पर

🏛️ अध्याय 2: लेखांकन के सैद्धांतिक आधार

  • GAAP (सामान्यतः स्वीकृत लेखांकन सिद्धांत) = अभिलेखन और प्रतिवेदन के सर्वमान्य नियम, ताकि खाते एकरूप और तुलनीय हों
  • व्यावसायिक इकाई: स्वामी और व्यापार अलग · मुद्रा मापन: सिर्फ़ वही दर्ज करो जो मुद्रा में व्यक्त हो सके
  • निरंतरता (चालू व्यापार): व्यापार लंबे समय तक चलेगा (इसलिए परिसंपत्तियाँ लागत घटा मूल्यह्रास पर) · लेखांकन अवधि: निश्चित अवधि के खाते, सामान्यतः 1 अप्रैल – 31 मार्च
  • लागत: परिसंपत्तियाँ क्रय मूल्य पर (ढुलाई, स्थापना सहित अधिग्रहण लागत) · द्विपक्ष: हर लेन-देन के दो प्रभाव → परिसंपत्तियाँ = देयताएँ + पूँजी
  • आगम मान्यता: आगम तब दर्ज हो जब अर्जित हो (माल बिका/सेवा दी), नकद मिलने पर नहीं · मिलान: एक अवधि के व्ययों को उसी अवधि के आगम से मिलाओ
  • पूर्ण प्रकटीकरण: सभी महत्त्वपूर्ण तथ्य बताओ · एकरूपता: हर वर्ष एक ही पद्धति · सारता: निर्णय को प्रभावित करने वाली मदों पर ध्यान
  • रूढ़िवादिता (विवेकशीलता): सभी संभावित हानियों का प्रावधान करो, संभावित लाभ मत गिनो (स्टॉक लागत या बाज़ार मूल्य, जो कम हो) · वस्तुनिष्ठता: सत्यापन योग्य प्रमाण (प्रमाणक) पर आधारित
  • प्रणालियाँ: दोहरा लेखा (दोनों पक्ष, पूर्ण, विश्वसनीय) बनाम इकहरा लेखा (अपूर्ण)रोकड़ आधार: नकद मिलने/देने पर ही दर्ज · उपार्जन आधार: अर्जित/उपगत होते ही दर्ज (NCERT पद्धति)
  • लेखांकन मानक (AS) ICAI द्वारा · Ind AS = निर्दिष्ट कंपनियों के लिए IFRS से मेल खाते मानक
  • GST: राज्य के भीतर → CGST + SGST (आधा-आधा) · अंतर-राज्यीय → IGST (पूरी दर) · केंद्रशासित प्रदेशों में UTGST

⚖️ अध्याय 3: लेन-देनों का अभिलेखन – I

  • परिसंपत्तियाँ = देयताएँ + पूँजी

    पूँजी = परिसंपत्तियाँ − देयताएँ · आगम/लाभ पूँजी बढ़ाते हैं · व्यय, हानियाँ और आहरण पूँजी घटाते हैं
  • स्रोत प्रलेख: कैश मेमो, बीजक/बिल, रसीद, पे-इन-स्लिप, चेक, नाम पत्र, जमा पत्र · प्रमाणक: रोकड़ (नाम/जमा) प्रमाणक, गैर-रोकड़ (हस्तांतरण) प्रमाणक, संयुक्त प्रमाणक
आधुनिक नियम (NCERT)वृद्धिकमी
परिसंपत्तियाँनामजमा
व्यय / हानियाँनामजमा
देयताएँजमानाम
पूँजीजमानाम
आगम / अभिलाभजमानाम
स्वर्णिम नियम (पारंपरिक)नामजमा
व्यक्तिगत खाता (व्यक्ति, फ़र्म, बैंक, पूँजी, आहरण)पाने वालादेने वाला
वास्तविक खाता (परिसंपत्तियाँ: रोकड़, फर्नीचर, माल)जो आएजो जाए
नाममात्र खाता (व्यय, हानियाँ, आय, अभिलाभ)सभी व्यय और हानियाँसभी आय और अभिलाभ
तिथिविवरणब.पृ.सं.नाम राशि (₹)जमा राशि (₹)
2026
अप्रैल 5
क्रय खाता नाम10,000
आगत CGST खाता नाम600
आगत SGST खाता नाम600
रोकड़ खाते से11,200
(12% GST पर माल ख़रीदा)
नामरोकड़ खाताजमा
तिथिविवरणरो.पृ.सं.₹तिथिविवरणरो.पृ.सं.₹
(जमा किया गया खाता) खाते से…(नाम किया गया खाता) खाते द्वारा…
शेष आगे ले गए (c/d)…
  • खतौनी: नाम किए गए खाते के नाम पक्ष में "दूसरा खाता + खाते से"; जमा किए गए खाते के जमा पक्ष में "दूसरा खाता + खाते द्वारा"
  • शेष निकालना: अंतर छोटे पक्ष में शेष आगे ले गए (c/d); अगली अवधि में उलटे पक्ष में शेष आगे लाए (b/d)वास्तविक व व्यक्तिगत खातों का शेष आगे ले जाते हैं; नाममात्र खाते लाभ-हानि खाते में बंद होते हैं
  • स्वामी द्वारा निकाला माल / दान में दिया माल / आग से नष्ट माल: क्रय खाता जमा (लागत पर)
  • GST समायोजन (set-off): आगत IGST → IGST, फिर CGST, फिर SGST · आगत CGST → CGST, फिर IGST · आगत SGST → SGST, फिर IGSTCGST का क्रेडिट SGST के विरुद्ध और SGST का CGST के विरुद्ध कभी नहीं। शुद्ध देय = निर्गत − आगत

💵 अध्याय 4: लेन-देनों का अभिलेखन – II

  • रोकड़ बही = प्रारंभिक प्रविष्टि की पुस्तक + खाता बही (रोकड़ खाता और बैंक खाता दोनों का काम); रोकड़ का शेष कभी जमा नहीं, बैंक का जमा शेष = अधिविकर्ष
नाम पक्ष (प्राप्तियाँ)जमा पक्ष (भुगतान)
तिथिप्राप्तियाँब.पृ.सं.रोकड़ ₹बैंक ₹तिथिभुगतानप्र.सं.ब.पृ.सं.रोकड़ ₹बैंक ₹
एक खाने वाली रोकड़ बही = हर पक्ष में सिर्फ़ रोकड़ का खाना · दो खाने वाली = रोकड़ + बैंक
  • विपरीत प्रविष्टि (Contra entry): बैंक में नकद जमा / बैंक से नकद निकासी; रोकड़ बही के दोनों पक्षों में, ब.पृ.सं. में C लिखो, खाता बही में खतौनी नहीं
  • चेक प्राप्त → बैंक खाने में नाम (उसी दिन जमा न हो तो रोकड़ खाने में) · चेक अनादृत → ग्राहक के नाम से बैंक खाने में जमा · बैंक प्रभार → बैंक खाने में जमा
  • लघु रोकड़ बही (अग्रदाय पद्धति): शुरू में निश्चित राशि दी जाती है; प्रतिपूर्ति = ख़र्च की गई राशि; शेष फिर अग्रदाय राशि के बराबरविश्लेषणात्मक लघु रोकड़ बही: डाक, लेखन-सामग्री, ढुलाई, वाहन व्यय, विविध के अलग खाने
  • विशेष बहियाँ: क्रय बही (सिर्फ़ माल का उधार क्रय) · क्रय वापसी बही (नाम पत्र) · विक्रय बही (सिर्फ़ माल का उधार विक्रय) · विक्रय वापसी बही (जमा पत्र)नकद क्रय/विक्रय रोकड़ बही में; परिसंपत्तियों का उधार क्रय मुख्य रोज़नामचे में
  • नाम पत्र माल लौटाते समय ख़रीदार भेजता है · जमा पत्र लौटाया माल स्वीकार करते समय विक्रेता भेजता है
  • मुख्य रोज़नामचा: प्रारंभिक, अंतिम (बंद करने वाली), समायोजन, संशोधन, हस्तांतरण प्रविष्टियाँ, परिसंपत्तियों का उधार क्रय/विक्रय, स्वामी द्वारा निकाला माल, आग/चोरी से हानि, भुगतान पर दिया/प्राप्त बट्टा

🏦 अध्याय 5: बैंक समाधान विवरण

  • बैंक समाधान विवरण = किसी तिथि पर रोकड़ बही के बैंक खाने और पास बुक/बैंक विवरण के शेष का अंतर समझाने वाला विवरण
  • रोकड़ बही का नाम शेष = अनुकूल = पास बुक का जमा शेष · रोकड़ बही का जमा शेष = अधिविकर्ष = पास बुक का नाम शेष
  • कारण: समय का अंतर (जारी चेक भुगतान हेतु प्रस्तुत नहीं, जमा चेक संग्रहीत नहीं, बैंक प्रभार, सीधे जमा, बैंक द्वारा संग्रहीत ब्याज/लाभांश, स्थायी निर्देश पर भुगतान, अनादृत चेक) और फ़र्म या बैंक की अशुद्धियाँ
मद (शुरुआत: अनुकूल शेष)रोकड़ बही से शुरूपास बुक से शुरू
जारी किए पर भुगतान हेतु प्रस्तुत न हुए चेकजोड़ो +घटाओ −
जमा किए पर संग्रहीत/जमा न हुए चेकघटाओ −जोड़ो +
बैंक प्रभार / अधिविकर्ष पर ब्याज (बैंक ने नाम किया)घटाओ −जोड़ो +
बैंक द्वारा सीधा भुगतान (स्थायी निर्देश)घटाओ −जोड़ो +
जमा किया चेक अनादृत (रोकड़ बही में दर्ज नहीं)घटाओ −जोड़ो +
बैंक द्वारा संग्रहीत ब्याज / लाभांशजोड़ो +घटाओ −
ग्राहक द्वारा बैंक में सीधे जमाजोड़ो +घटाओ −
  • तर्क: पूछो "इस मद के कारण दूसरा शेष ज़्यादा है या कम?" ज़्यादा → जोड़ो; कम → घटाओ
  • अधिविकर्ष से शुरुआत: अधिविकर्ष को ऋणात्मक (माइनस) रकम लिखो और वही तालिका लगाओ (सबसे आसान)। अगर अधिविकर्ष को धनात्मक रकम ही रखते हो, तो तालिका का हर चिह्न उलट जाता है।
  • समायोजित (संशोधित) रोकड़ बही: पहले रोकड़ बही में न लिखी मदें ठीक करो (बैंक प्रभार, सीधे जमा, ब्याज, अनादरण, रोकड़ बही की अशुद्धियाँ); फिर समाधान विवरण में सिर्फ़ पास बुक में न आई मदें

🔍 अध्याय 6: तलपट एवं अशुद्धियों का संशोधन

  • तलपट = किसी तिथि पर खाता बही के सभी शेषों की सूची; नाम योग = जमा योगउद्देश्य: गणितीय शुद्धता जाँचना, अशुद्धियाँ ढूँढने में मदद, वित्तीय विवरण बनाने में मदद। विधियाँ: योग, शेष (सबसे प्रचलित), योग-सह-शेष
  • नाम शेष: परिसंपत्तियाँ, व्यय, हानियाँ, आहरण, क्रय, विक्रय वापसी · जमा शेष: देयताएँ, पूँजी, आगम, अभिलाभ, विक्रय, क्रय वापसी
  • तलपट मिलना ≠ अशुद्धि-रहित: सैद्धांतिक अशुद्धि, पूर्ण भूल, क्षतिपूरक अशुद्धि और सही पक्ष में ग़लत खाते में खतौनी योग नहीं बिगाड़तीं
अशुद्धिअर्थ / उदाहरणतलपट पर प्रभाव?
लेखन (Commission)ग़लत राशि, ग़लत योग, ग़लत पक्ष, ग़लत खाता, ग़लत शेषअधिकतर हाँ (सही पक्ष में ग़लत खाता, या प्रारंभिक प्रविष्टि की पुस्तक में ग़लती हो तो नहीं)
भूल (Omission)पूर्ण भूल (प्रविष्टि ही नहीं) / आंशिक भूल (एक पक्ष की खतौनी नहीं)पूर्ण: नहीं · आंशिक: हाँ
सैद्धांतिक (Principle)पूँजीगत और आयगत में भ्रम (जैसे मशीनरी को क्रय खाते में नाम करना)नहीं
क्षतिपूरक (Compensating)एक अशुद्धि दूसरी बराबर अशुद्धि को निष्प्रभावी कर देनहीं
  • संशोधन का तरीका: (जो प्रविष्टि होनी चाहिए थी) − (जो प्रविष्टि हुई) = संशोधन प्रविष्टि; ग़लत को रद्द करो, सही को लिखो
  • एकपक्षीय अशुद्धि (सिर्फ़ एक खाता प्रभावित) → उचंत खाते से संशोधन · द्विपक्षीय अशुद्धि → दोनों खातों के बीच सामान्य रोज़नामचा प्रविष्टि
  • उचंत खाता: तलपट का नाम पक्ष कम → उचंत नाम पक्ष में; जमा पक्ष कम → जमा पक्ष मेंसभी एकपक्षीय अशुद्धियाँ ठीक होने पर उचंत खाता अपने आप बंद (शून्य शेष)
  • अगले वर्ष संशोधन: पिछले वर्ष ग़लत प्रभावित नाममात्र खातों के लिए लाभ-हानि समायोजन खाता

📉 अध्याय 7: मूल्यह्रास, प्रावधान एवं संचय

  • मूल्यह्रास = स्थायी परिसंपत्ति की मूल्यह्रास योग्य राशि का उसके उपयोगी जीवनकाल पर व्यवस्थित आबंटन; लाभ पर गैर-नकद भारअवक्षय = प्राकृतिक संसाधन (खानें, तेल कुएँ) · परिशोधन = अमूर्त परिसंपत्तियाँ (पेटेंट, कॉपीराइट, ख्याति)
  • कारण: टूट-फूट · वैधानिक अधिकारों की समाप्ति · अप्रचलन · असामान्य कारक (दुर्घटना, आग) · कारक: लागत, अनुमानित शुद्ध अवशिष्ट मूल्य, मूल्यह्रास योग्य लागत, उपयोगी जीवनकाल
  • सीधी रेखा पद्धति: मूल्यह्रास = परिसंपत्ति की लागत − शुद्ध अवशिष्ट मूल्यउपयोगी जीवनकालहर वर्ष समान राशि। दर = वार्षिक मूल्यह्रासअधिग्रहण लागत × 100। लागत ₹2,00,000, अवशिष्ट ₹20,000, जीवन 6 वर्ष → ₹30,000 प्रति वर्ष, दर 15%
  • क्रमागत ह्रास पद्धति: मूल्यह्रास = प्रारंभिक पुस्तक मूल्य × दर; दर R = [1 − ⁿ√sc] × 100 (s = अवशिष्ट मूल्य, c = लागत, n = जीवनकाल)हर वर्ष घटती राशि; मूल्य कभी शून्य नहीं होता। ₹1,00,000 @ 20%: 20,000 → 16,000 → 12,800
  • वर्ष के बीच ख़रीदी परिसंपत्ति: सिर्फ़ उपयोग के महीनों का मूल्यह्रास (महीने12)
  • विधि 1 (परिसंपत्ति खाते में): मूल्यह्रास खाता नाम / परिसंपत्ति खाते से · विधि 2: मूल्यह्रास खाता नाम / मूल्यह्रास प्रावधान खाते से (परिसंपत्ति लागत पर ही रहती है)
  • परिसंपत्ति का विक्रय: लाभ/हानि = विक्रय मूल्य − विक्रय तिथि पर पुस्तक मूल्य · परिसंपत्ति निपटान खाता में लागत, संचित मूल्यह्रास और विक्रय राशि आती है; शेष = लाभ या हानि
आधारप्रावधानसंचय
प्रकृतिलाभ पर भारलाभ का विनियोजन
उद्देश्यचालू अवधि की ज्ञात देयता/व्यय, राशि अनिश्चितवित्तीय स्थिति मज़बूत करना; कुछ क़ानूनन अनिवार्य
कर योग्य लाभघटाता हैकोई प्रभाव नहीं
तुलन पत्रसंबंधित परिसंपत्ति से घटाकर, या चालू देयताओं के साथदेयता पक्ष में पूँजी के बाद (संचय एवं आधिक्य)
अनिवार्यतालाभ न हो तब भी बनाना ज़रूरीसिर्फ़ लाभ से; सामान्यतः प्रबंधन की इच्छा पर
लाभांशउपयोग नहीं हो सकतासामान्य संचय का उपयोग हो सकता है
  • संचय: सामान्य (मुक्त) बनाम विशिष्ट (लाभांश समानीकरण संचय, कर्मचारी क्षतिपूर्ति कोष, निवेश उच्चावचन कोष, ऋणपत्र शोधन संचय) · आयगत बनाम पूँजी संचय (पूँजीगत लाभ से, जैसे अंशों पर प्रीमियम, स्थायी परिसंपत्ति के विक्रय पर लाभ)
  • गुप्त संचय: परिसंपत्तियाँ कम या देयताएँ ज़्यादा दिखाकर बना छिपा संचय (जैसे ज़रूरत से ज़्यादा मूल्यह्रास)